औरैया का सम्पूर्ण इतिहास History of Auraiya in hindi

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औरैया की गौरवशाली एवं वैभवशाली गाथा

औरैया का गौरव: औरैया का इतिहास ऐतिहासिक दृष्टि से जनपद औरैया का अतीत अत्यंत महिमामंडित रहा है। परिवर्तन के शाश्वत नियम के अनेक झंझावातों के बावजूद औरैया अस्तित्व अक्षुण्य् रहा है। औरैया के उत्पत्ति का इतिहास निम्न प्रकार से है। इतिहास में औरैया की आज तक की जानकारी।

औरैया उत्तर प्रदेश: औरैया भारत में उत्तर प्रदेश राज्य का एक प्रमुख मुख्यालय एवं नगरपालिका है। प्राचीन काल में पांचाल राज्य में शामिल था। जनपद मुख्यालय बनने से पूर्व यह इटावा जनपद का तहसील मुख्यालय रहा है। यह जिला कानपुर मंडल के अंतर्गत है। अजीतमल तहसील का शिक्षा के क्षेत्र मे जिले मे प्रथम स्थान है।

औरैया जनपद की स्थापना: जनपद के रूप में औरैया का इतिहास नया है। 17 सितम्बर 1997 को इटावा जनपद की दो तहसीलों औरैया और विधूना को काटकर एक नये जनपद का सृजन किया गया और इसका मुख्यालय प्रमुख रेलवे स्टेशन दिबियापुर से औरेया जाने लगभग 22 किलोमीटर मार्ग के मध्य में काकोर नामक स्थान पर बनाया गया।

औरैया जनपद की स्थिति: इस जिले के उत्तर में कन्नौज जिला, दक्षिण में यमुना नदी और जिला जालौन, पूर्व में जिला कानपुर देहात तथा पश्चिम में जिला इटावा स्थित है। औरैया जनपद मुख्यालय राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 2 मुगल रोड पर स्थित है जो कि कानपुर महानगर से 105 किलोमीटर पश्चिम तथा इटावा जनपद मुख्या‍लय से 63 किलोमीटर पूर्व में है। इस क्षेत्र की ऐतिहासिकता इसे मराठों के गौरव से लेकर अवध के इतिहास तक जोड़ती है जो कि प्राचीन काल में पांचाल राज्य में शामिल था।

औरैया उत्तर प्रदेश आधुनिक इतिहास

रोहिल्लास के अंतर्गत 1760 ई. में: रोहिल्लास के अंतर्गत 1760 ई. अहमद शाह दुर्रानी ने भारत पर आक्रमण किया। अहमद शाह दुर्रानी का पानीपत के मैदान पर मराठों द्वारा 1761 में विरोध किया गया लेकिन अहमद शाह दुर्रानी ने मराठाओं को हरा दिया। जिसमे मराठा सरदारों के अलावा गोविन्द राव पंडित ने भी युद्ध में अपना जीवन खो दिया।

अहमद शाह दुर्रानी ने रोहिल्ला सरदारों को देश के बड़े हिस्सों में भेजा: धुंदे खान को शिकोहाबाद, इनायत खांन (हाफीज़ रहमत खान के बेटे) को इटावा भेजा जो कि मराठों के कब्जे में था। 1762 में एक रोहिल्ला सेना मुल्ला मोहसिन खान के नेतृत्व में मराठो से सम्पत्ति को हथियाने के लिए भेजी गयी थी इस सेना का इटावा शहर के निकट किशन राव व बाला राव पंडित (यमुना पार की सुरक्षा के लिये प्रतिबद्ध) के द्वारा विरोध किया गया। मोहसिन खान द्वारा इटावा के किले की घेराबन्दी की गयी थी लेकिन किलेदार ने जल्द ही आत्मसमर्पण कर दिया और जिला रोहिल्लास के हाथों में चला गया।

इनायत खान का राजस्व: जमींदारों ने इनायत खान कर देने से मना कर दिया और अपने किलों में अवज्ञा का अधिकार महफूज कर दिया। शेख कुबेर और मुल्ला बाज़ खान के नेतृत्व में मजबूत सैन्य बल और कुछ तोप खाने रोहिल्लास भेजे गये और बहुत सारे छोटे किले मिट्टी में मिल गये लेकिन इतनी कठोरता में भी जमुना पार क्षेत्र के कमैत के जमींदार ने इनायत खान के अधिकार का विरोध किया। उसके बाद हाफिज़ रहमत और इनायत खान खुद इटावा आये और जमींदारों के खिलाफ कार्यवाही को तेज किया और अन्ततः वे सन्धि के लिए तैयार हो गये। बाद में हाफिज़ रहमत बरेली चले गये और रोहिल्ला चौकियाँ जिले में स्थापित कर दी गयी।

राजा नाजिब खान का शासन: राजा नाजिब खान का दिल्ली में उदय हुआ। नाजिब खान को नाजिब-उद् –दौला, आमिर-उल-उमरा, शुजा उद- दौला के नाम से भी जाना जाता है। नबाब वाजिर ने सफदर जंग में सफलता प्राप्त की और दुर्रानी द्वारा रोहिल्लास की दी गयी जमींन के अलावा बंगश से अलीगढ़ तक की सम्पत्ति पर कब्जा कर लिया लेकिन फर्रुखाबाद के अफगानों को नाजिब खान की दुश्मनी बर्दाश्त नहीं हुई और 1762 में उसने फर्रुखाबाद पर हमले में शामिल होने के लिए नाजिब-उद-दौला को मनाया। हमला हाफिज़ रहमत खान की सहायता से जीता गया और एक बार फिर मामले शान्ति से सुलझ गये। महत्वाकांक्षी नाजिब-उद-दौला 1762 में अहमद खान की तरफ से बांग्ला देश की ओर से रोहिल्लास के हस्तक्षेप से काफी चिढ़ गया था और वह भी बदला लेने के लिये जल्दी से अपनी योजनाओं को आगे बढ़ाने में लगा हुआ था, उसने 1770 में हाफिज़ रहमत खान के पतन की साजिश रचना शुरु कर दिया।

मराठों का आक्रमण: 1766 में मराठों ने एक बार फिर मल्हार राव, के नेतृत्व में जमुना पार करके फंफूद पर आक्रमण कर दिया। जहाँ पर मुहम्मद हसन खान (मोहसिन खान के सबसे बड़े पुत्र) के नेतृत्व में रोहिल्लास सेना तैनात की गयी थी। इस खबर के मिलने पर हाफिज़ रहमत बरेली से मराठों का सामना करने के लिये आगे बढ़ा। मल्हार राव एक बार फिर वह जमुना पार चला गया।

जबीता खान: कोइल में नाजिब-उद-दौला बीमार पड़ गया और उसने अपने सबसे बड़े पुत्र जबीता खान को मराठों की सहायता करने के लिये छोड़कर अपने कदम पीछे ले लिये। जबीता खान ने किसी भी तरह से अपने अफगान भाईयों के खिलाफ युद्ध का निपटारा नहीं किया। यह जानने पर मराठों ने जबीता खान को अपने शिविर में ही कैदी बना लिया। जबीता खान ने हाफिज रहमत खाने से अपनी रिहाई प्राप्त करने के लिये अनुरोध किया। जिसके बाद हाफिज रहमत खान ने जबीता खान की रिहाई के लिये मराठों से बात शुरु की, लेकिन मराठा नेताओं ने इसके बदले इटावा और शिकाहाबाद के जागीर के आत्मसमर्पण की माँग की। हाफिज रहमत खान उन शर्तो को मानने से इंकार कर दिया, इसी बीच मराठों से सौदा करने के बीच में जबीता खान बच के भाग निकला। अब मराठों और अफगाँन सेनाओं के बीच में कई अनियमित सन्धियाँ हुई।

औरैया के पर्यटन स्थल एवं धार्मिक स्थल: भगवा काली, कामदेव, गुरैया, देवी काली, बडी देवी ,कलेक्ट्रेट आदि औरैया के पर्यटन स्थल है।

औरैया में देखने योग्य जगह क्या है ?
भगवा काली
कामदेव
गुरैया
देवी काली
बडी देवी
कलेक्ट्रेट

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