आज़मगढ़ का सम्पूर्ण इतिहास, कैफ़ी आजमी नगर आज़मगढ़ History of Azamgarh in hindi

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आज़मगढ़ की गौरवशाली एवं वैभवशाली गाथा

आज़मगढ़ का गौरव: भारतवर्ष अपनी विविधताओं के साथ अपना गौरवशाली इतिहास को समेटे हुये है, ऐतिहासिक दृष्टि से जनपद आज़मगढ़ का अतीत अत्यंत गौरवशाली और महिमामंडित रहा है। पुरातात्विक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, भौगोलिक तथा औध्योगिक दृष्टि से आज़मगढ़ का अपना विशिष्ट स्थान है। हिन्दू मुस्लिम सांप्रदायिक सदभाव, आध्यात्मिक, वैदिक, पौराणिक, शिक्षा, संस्कृति, संगीत, कला, सुन्दर भवन, धार्मिक, मंदिर, मस्जिद, ऐतिहासिक दुर्ग, गौरवशाली सांस्कृतिक कला की प्राचीन धरोहर को आदि काल से अब तक अपने आप में समेटे हुए आज़मगढ़ का विशेष इतिहास रहा है। आदिकवि महर्षि वाल्मीकि के तप से पावन तमसा के प्रवाह से पवित्र आजमगढ़ न जाने कितने पौराणिक, मिथकीय, प्रागैतिहासिक और ऐतिहासिक तथ्यों और सौन्दर्य को छिपाए अपने अतीत का अवलोकन करता प्रतीत हो रहा है। आज़मगढ़ के उत्पत्ति का इतिहास निम्न प्रकार से है। इतिहास में आज़मगढ़ की आज तक की जानकारी।

आज़मगढ़ उत्तर प्रदेश: आजमगढ़ भारतीय राज्य उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ सम्भाग के तीन जिलों में से एक जिला है। इसका जिला मुख्यालय आजमगढ़ है। तमसा नदी (टोंस) के पावन तट पर स्थित यह जनपद आज़मगढ़ अनेक ऋषियों की पावन पुण्य भूमि है। आज़मगढ़ जनपद उत्तर प्रदेश के पूर्वी भाग में स्थित है, जो गंगा नदी और घाघरा नदी के मध्य बसा हुआ है। यह जनपद आदि काल से ही मनीषियों, ऋषियों, चिन्तकों, विद्वानों और स्वतंत्रता सेनानियों की जन्म स्थली रही है। इस जनपद को नवाब आज़मशाह ने बसाया था, इसी कारण इसका नाम आज़मगढ़ पड़ा। 15 नवम्बर, 1994 को चौदहवें मण्डल के रूप में ‘आजमगढ़ मण्डल’ का सृजन किया गया। उत्तर प्रदेश के पूर्वी भाग में आने वाला यह जिला आजमगढ़ प्रमंडल के अंतर्गत आता है। इस प्रमंडल के अंतर्गत कुल 3 जिले आते हैं: आजमगढ़ ,मऊ और बलिया।

आज़मगढ़ का सम्पूर्ण इतिहास

आजमगढ़ का पुराना नाम या उपनाम: आजमगढ़ का पुराना नाम या उपनाम कैफ़ी आजमी नगर है।

महाऋषियो की कर्मभूमि आजमगढ़: आजमगढ़ में महामुनि आत्रि और सत्य की प्रतीक उनकी पत्नी अनुसूया के तीनों पुत्रों महर्षि दुर्वासा, दत्तात्रेय और महर्षि चन्द्र की कर्मभूमि का गौरवशाली इतिहास रहा है।

महर्षि दुर्वासा की तपोस्थली आजमगढ़: यह धरती ऋषि -मुनियों की तपोस्थली रही है। त्रिदेवों ने इस जगह को कर्मभूमि तथा तपोस्थली बनाकर इसका मान बढाया। आजमगढ़ को ऋषि दुर्वासा की भूमि के रूप में भी जाना जाता है, जिनका आश्रम फूलपुर तहसील में स्थित था, जो फूलपुर तहसील मुख्यालय से 6 किलोमीटर (3.7 मील) उत्तर में तमसा और मझुए नदियों के संगम के पास था। भगवान शिव के अंश महर्षि दुर्वासा तमसा नदी के किनारे अपनी तपोस्थली त्रेता युग में बनाया था, ये आज भी आस्था का प्रमुख केंद्र है।

रामायणकालीन कोशल राज्य आजमगढ़: पौराणिक मान्यताओं के अनुसार रामायण में यह क्षेत्र कोशल राज्य का एक हिस्सा था। ऋषि विश्वामित्र राम-लक्ष्मण को सरयू (घाघरा) के किनाने-किनारे लेकर बलिया होते हुए जनकपुर सीता स्वयंवर में ले गए थे। जनश्रुति के अनुसार वे एक रात्रि सरयू तट पर दोहरीघाट में विश्राम किए थे, इसीलिए इसका नाम दोहरीघाट पड़ा।

कौशल राज्य आजमगढ़: उत्तर प्रदेश का पूर्वी जिला आज़मगढ़ एक समय अपने उत्तर-पूर्वी हिस्से को छोड़कर प्राचीन कौशल राज्य का हिस्सा था। कौशल ने बुद्ध के समय उत्तर भारत के चार शक्तिशाली राजाओं के बीच प्रमुखता से विचार किया, तब इसकी समृद्धि अपने चरम पर पहुंच गई थी। कौशल का राज्य पूर्व में गंगा और मगध के राज द्वारा, उत्तर -पूर्व में वृजी-लिच्छवियों के क्षेत्र और उत्तर में मल्ल के द्वारा, पश्चिम में सुरसेना द्वारा घिरा हुआ था और दक्षिण और दक्षिण-पश्चिम में वत्स राज्य द्वारा, कौशाम्बी राजधानी के रूप में।

प्राचीन काल में आज़मगढ़: प्राचीन काल में आज़मगढ़ में भार, सोरिस और चेरस जैसे पुराने स्वदेशी लोग रहते थे, जो इस क्षेत्र के आदिवासियों के वंशजों का प्रतिनिधित्व करते थे। इस जिले में कई तटबंधों, टैंकों, गुफाओं और पत्थर के किलों के अवशेष पाए जाते हैं जो अभी भी अपनी ऊर्जा और कौशल को धारण करते हैं।

मुग़ल बादशाह जहाँगीर का शासन (मेहनगर) आजमगढ़: जिला मुख्यालय से 30 किलोमीटर पर स्थित मेहनगर आजमगढ़ का नाभिनाल से जुडा हुआ है। 16वी शताब्दी के उत्तरार्ध में दिल्ली पर मुग़ल बादशाह जहाँगीर का शासन था। 1594 ई में युसूफ खाँ जौनपुर के सूबेदार नियुक्त हुआ। तब मेहनगर आजमगढ़ जौनपुर सूबे में ही आता था। फतेहपुर के समीप के राजपूत चन्द्रसेन सिंह के पुत्र अभिमान सिंह (अभिमन्यु सिंह) जहाँगीर की सेना में सिपहसालार थे। उन दिनों जौनपुर सूबे के पूर्वी हिस्से में काफी असंतोष फैला हुआ था। जहाँगीर ने यह जिम्मेदारी अभिमन्यु सिंह को सौपी। वहाँ की देख रेख कर अभिमन्यु सिंह ने एक बार नहीं तीन बार वहाँ के विद्रोह को समाप्त कर दिया। इस कार्य से प्रसन्न होकर जहाँगीर ने 1500 घुड़सवार और 92.5000 रुपयों के साथ ही जौनपुर राज्य के पूर्वी इलाकों के 22 परगनों को अभिमन्यु सिंह को सौंप दिया।

अभिमन्यु सिंह से दौलत इब्राहिम खाँ: इस जागीर को पाकर अभिमन्यु सिंह ने अपनी स्वतंत्र जागीर स्थापित की और मेहनगर को अपनी राजधानी बनाया। बाद में अभिमन्यु सिंह ने परिस्थितिवश इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया और उनका नाम दौलत इब्राहिम खाँ पड़ा। नि: संतान होने के कारण उन्होंने अपने भतीजे हरिवंश सिंह को अपना राज्याधिकारी बनाया। हरिवंश सिंह ने ही मेहनगर का किला बनवाया तथा 20 वर्षों तक राज किया हरिवंश सिंह ने ही हरी बाँध पोखरा, लखराव पोखरा तथा रानी सागर पोखरा बनवाया था।

राजा हरिवंश सिंह: राजा हरिवंश सिंह ने ही अपने चाचा दौलत इब्राहिम खाँ की याद में 36 दरवाजों वाला मकबरा बनवाया, जो आज भी मेहनगर कस्बे में स्थित है। यह मकबरा अपने तत्कालीन वास्तु एवं स्थापत्य कला की बेमिसाल कलाकारी का नमूना है। बाद में हरिबंश सिंह ने इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया। राजा हरिवंश सिंह के इस्लाम धर्म को स्वीकारने के कारण इनकी पत्नी रानी ज्योति कुँवर सिंह अपने छोटे बेटे राजा विक्रमजीत सिंह को लेकर चली गयीं। जिस स्थान पर वे रहने आईं उसी स्थान को आज रानी की सराय के रूप में हम सब जानते हैं। बाद के दिनों में रानी के बेटे धरणीधर सिंह ने भी मुस्लिम लड़की से विवाह कर के इस्लाम धर्म को स्वीकार कर लिया। उन्हीं के दो पुत्रो ने आजम खाँ और अजमत खाँ ने राज्य की बागडोर संभाली।

आजमगढ़ नाम कैसे पड़ा: आज़मगढ़ जनपद का नाम इसके मुख्यालय आजमगढ़ के नाम पर रखा गया है। राजा विक्रमजीत परगना निज़ामाबाद में मेहनगर के गौतम राजपूत वंश के थे जिन्होंने बाद में इस्लाम अपना लिया था। उन्होंने एक मुस्लिम महिला से शादी किया था जिससे उन्हें 2 पुत्र प्राप्त हुए आज़म और अज़मत, राजा विक्रमजीत के पुत्र नवाब आज़मशाह ने शाहजहां के शासनकाल के दौरान 1665 ई. में फुलवारिया नामक प्राचीन ग्राम के स्थान पर आजमगढ़ को स्थापित किया था। उन्हीं के नाम पर इस स्थान का नाम आजमगढ़ पड़ा। आज़म खान ने इस शहर की स्थापना ऐलवाल और फुलवरिया के खंडहरों से की थी।

आजमगढ़ की स्थापना: आज़मगढ़ की स्थापना राजा विक्रमजीत के पुत्र नवाब आज़मशाह ने शाहजहां के शासनकाल के दौरान 1665 ई. में फुलवारिया नामक प्राचीन ग्राम के स्थान पर आजमगढ़ को स्थापित किया था। आजम ख़ाँ के नाम पर इस स्थान का नाम आजमगढ़ पड़ा। आज़म खान ने इस शहर की स्थापना ऐलवाल और फुलवरिया के खंडहरों से की थी।

नवाब आज़मशाह : आज़म ने अपने नाम से शहर का नाम आज़मगढ़ शहर बसाया और किला को अपना नाम दिया था। शहर की पूर्व दिशा पर तमसा नदी के तट पर आजम ख़ाँ ने एक दुर्ग का निर्माण भी करवाया था।

अज़मतशाह: अजमत शाह ने अजमतगढ़ बसाया जो जीयनपुर बाजार के पास सगड़ी तहसील में पड़ता है। अज़मत ने किले का निर्माण किया और परगना सगरी में आज़मगढ़ के बज़ार को बसाया। 1688 में चैबील राम के हमले के बाद, अज़मत खान अपने सैनिकों के साथ उत्तर की ओर भाग गया, अजमत शाह गोरखपुर में घाघरा पार करने का प्रयास किया, लेकिन चिल्लूपार (बड़हलगंज) के लोगों ने उसके आने का विरोध किया, और अज़मतशाह तो मध्य धारा में गोली मार दी गई या बचने के प्रयास में डूब गया। आजमशाह की कन्नौज में 1675 ई0 में मृत्यु हो गई। अज़मत के वंशज इस क्षेत्र के राजा बने। अज़मत का पुत्र इकराम शासन व्यवस्था देखता था। उसके छोटे भाई का नाम मोहब्बत था। बाद में इस परिवार से केवल मोहब्बत का पुत्र इरादत ही बचा जो सिमटी हुई जमींदारी संभालने लगा।

मोहब्बत खान का आज़मगढ़ में शासन: अठारहवीं सदी के प्रारंभ में आजमगढ़ जौनपुर और गाजीपुर की सरकारों के अधीन रहा। उस समय आजमगढ़ का राजा मोहब्बत शाह था। उनके समय में आज़मगढ़ की समृद्धि अपने चरम पर थी। 18 सितंबर, 1832 को आजमगढ़ जिले का गठन किया गया था। 1957-58 के संघर्ष के बाद जिले में गोरक्षिणी या 1893 के गौ-हत्या विरोधी आंदोलन को छोड़कर कोई भी बड़ी घटना 19 वीं सदी के अंत तक नहीं हुई।

आजमगढ़ का सृजन: 15 नवम्बर 1994 को चौदहवें मण्डल के रूप में “आजमगढ़ मण्डल ” का सृजन किया गया। आजमगढ़ जिले में आठ तहसीले है। जो लालगंज, सदर, सगड़ी, मेंहनगर, बूढ़नपुर, निजामबााद,मार्टीनगंज व फूलपुर है। सबसे बड़ी तहसील निजामबााद है। आज़मगढ़ में 22 ब्लॉक है। 10 विधानसभा वह 2 लोकसभा सीट है, 2 नगरपालिका व 11 नगर पंचायत भी है।

1857 की स्वतंत्रता क्रांति में आजमगढ़ की योगदान: स्वतंत्रता आंदोलन के समय में भी आजमगढ़ का विशेष महत्व रहा है। 1857 में स्वतंत्रता की पहली लड़ाई में भी शहर ने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। भारत के स्वतंत्र होने के बाद, लगभग 472 ‘आज़मगढ़ियों’ को स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान के लिए, उनके या उनके परिवार के सदस्यों को दिए गए ताम्र पदक से 1973 मे सम्मानित किया गया। 3 अक्टूबर, 1929 को महात्मा गांधी ने आजमगढ़ का दौरा किया और श्रीकृष्ण पाठशाला में एक सभा का आयोजन हुआ जिसमें लगभग 75000 लोगों ने हिस्सा लिया तथा 5000 रुपये गांधी जी को भेंट किया गया।

महात्मा गांधी की कई यात्रा और भाषण आजमगढ़ में: 1800 से 1947 के अंत में, जब भारत अपनी आजादी के लिए अंग्रेजों से लड़ रहा था, आजमगढ़ महात्मा गांधी की कई यात्राओं और भाषणों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था।

भारत छोड़ो आंदोलन में एक महत्वपूर्ण भूमिका आजमगढ़: आजमगढ़ स्वतंत्रता आंदोलन के लिए भी पहचाना जाता है, गांधीजी के कहने पर सन 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में अतरौलिया खंड के रामचरित्र सिंह व उनके नाबालिक बेटे सत्यचरण सिंह ने एक साथ अंग्रेजो का डटकर मुकाबला किया और गोली खायी। पिता पुत्र का एकसाथ स्वतंत्रा के आंदोलन में कूदने का दुर्लभ ही उदाहरण देखने को मिलता है।

आज़मगढ़ जनपद की स्थिति: आज़मगढ़ तमसा नदी के तट एवं घाघरा नदी के दक्षिण में स्थित है। आज़मगढ़ का प्रशासनिक मुख्यालय, लखनऊ- बलिया राज्य राजमार्ग पर राजधानी लखनऊ से, 269 किमी पर है। उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में स्थित आजमगढ़ ज़िले के साथ-साथ एक मंडल भी है, जिसमें तीन जिलों आज़मगढ़, मऊ और बलिया शामिल हैं। आजमगढ़ का नाम देश-विदेश में अनजाना नहीं है। भौगोलिक दृष्टि से, आजमगढ़ उत्तर प्रदेश के पूर्वी हिस्से में स्थित है। आजमगढ़ जनपद पूर्व में मऊ जिले, उत्तर में गोरखपुर, दक्षिण-पूर्व में गाज़ीपुर, दक्षिण-पश्चिम में जौनपुर, पश्चिम में सुल्तानपुर और उत्तर पश्चिम में अम्बेडकर नगर से घिरा हुआ है। भौगौलिक रूप से देखें तो आजमगढ़ की स्थिति 26°04′N 83°11′E / 26.06, 83.19. पर है। यहां की औसत ऊंचाई है 64 मीटर (209 फीट) है।

आजमगढ़ की साहित्य एवं संस्कृति परिचय: आजमगढ़ शहर अपनी साहित्य, संस्कृति, शिक्षा के लिए आरंभ से ही मशहूर रहा है। आजमगढ़ को यह गौरव प्राप्त है कि वह राहुल सांकृत्यायन, अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’, मौलाना शिबली नोमानी और कैफ़ी आज़मी जैसे महापुरुषों की जन्म-स्थली रही है। आज भी यहाँ से तमाम राजनेता, प्रशासक, शिक्षाविद, साहित्यकार, कलाकार, व्यवसायी, खिलाडी देश-दुनिया में अपने नाम का डंका बजाते नजर आते हैं। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे राम नरेश यादव यहीं की देन हैं, तो चंद्रजीत यादव, अमर सिंह जैसे तमाम चर्चित राजनेता भी यहीं की पैदाइश हैं। मशहूर हिन्दी अभिनेत्री और सोशल एक्टिविस्ट शबाना आज़मी का यहाँ से पुराना रिश्ता है। महर्षि दुर्वासा, दत्तात्रेय, वाल्मीकि, महापंडित राहुल सांकृत्यायन, अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’, शिक्षाविद अल्लामा शिबली नोमानी, कैफी आजमी और श्यामनारायण पांडेय के आदि का सम्बन्ध आजमगढ़ से रहा है।

आजमगढ़ धार्मिक गतिविधि एवं त्यौहार: जिले की पारंपरिक भाषाएं भोजपुरी भाषा और पुर्वी हैं। लोगों द्वारा पूजे जाने वाले प्रमुख देवता भगवान ब्रह्मा, भगवान विष्णु, भगवान शिव, देवी लक्ष्मी, भगवान राम, भगवान हनुमान, भगवान गणेश और देवी दुर्गा के नौ रूप हैं। नदी में एक पवित्र डुबकी लेने की प्रथा भी प्रसिद्ध है। निजामगढ़ के लोगों द्वारा मनाए जाने वाले महत्वपूर्ण त्योहार हैं नव दुर्गा, रामनवमी, कृष्ण जन्माष्टमी, शिवरात्रि, दिवाली, दशहरा और होली। जिले के अधिकांश मुसलमान सुन्नी संप्रदाय के हैं। वे ज्यादातर बुनकर हैं। जिले में सिख, ईसाई, बौद्ध और जैन बहुत कम संख्या में पाए जाते हैं।

राहुल सांकृत्यायन आजमगढ़ का महत्वपूर्ण व्यक्तित्व: आजमगढ़ के महत्वपूर्ण व्यक्तित्व राहुल सांकृत्यायन जी हैं। जिन्होंने यात्रावृतांत साहित्य की नींव रखी और इस क्षेत्र में एक कीर्तिमान स्थापित किया। राहुल सांकृत्यायन जी का हिंदी सहित्य में महत्वपूर्ण स्थान है।

आजमगढ़ के वाहन मार्ग: आजमगढ़ के उत्तर में स्थित घाघरा नदी आजमगढ़ और गोरखपुर के सीमा का निर्धारण करती है आजमगढ़ से गोरखपुर जाने का एक वाहन मार्ग दोहरीघाट से होकर जाता है जो कि मऊ जिले का हिस्सा है और एक वाहन मार्ग अंबेडकरनगर के (कम्हरिया घाट) से हो कर जाता है अन्य मार्ग और भी है परन्तु नाव द्वारा ही जा सकते है जिनमे बारानगर घाट और गोला घाट प्रमुख है आजमगढ़ का सबसे उत्तरी पुलिस स्टेशन रौनापार थाना है जो घाघरा नदी से लगभग 9 Km दूर स्थित है।

तमसा (टोंस) नदी आजमगढ़: तमसा नदी का सांस्कृतिक, पौराणिक और ऐतिहासिक महत्त्व कम नहीं है। इसी के पावन तट पर आदि कवि महर्षि वाल्मीकि का आश्रम था, जहां आदिकाव्य रामायण का सृजन हुआ। इसी आश्रम में जगत जननी माँ सीता ने वनवास काटा और लव-कुश का जन्म हुआ। इसी के तट पर भगवान दत्तात्रेय का आश्रम भी है जहां तमसा अपनी छोटी बहन कुंवर नदी से मिलती है तो दुर्वासा का आश्रम तमसा और मझुई के संगम पर है। तमसा आज जैसी भी स्थिति में हो, रामायण काल में यह एक पवित्र और महत्त्वपूर्ण नदी थी। गोस्वामी तुलसीदास ने अयोध्या कांड में इसका कई बार उल्लेख किया है। राम वनगमन और भरत के मनाने जाने के क्रम में तुलसीदास जी ने इसके महत्व को बताया है।

आज़मगढ़ के दर्शनीय स्थल: आजमगढ़ के दर्शनीय स्थल, आजमगढ़ के पर्यटन स्थल, आजमगढ़ में घूमने लायक जगह में विभिन्न बाजार और खुबसूरत स्थान भी हैं, जिन्हें देखे बिना आजमगढ़ की यात्रा, आजमगढ़ भ्रमण, आजमगढ़ की सैर अधूरी रहती है। हम अपने इस लेख मे आजमगढ़ के इन्हीं खूबसूरत दर्शनीय स्थल के बारे मे बताएंगे।

आजमगढ़ में देखने योग्य जगह क्या है ?

महाराजगंज
मुबारकपुर
मेहनगर
दुर्वासा आश्रम
बाबा भंवरनाथ मंदिर
अवन्तिकापुरी
दत्तात्रेय आश्रम
निजामाबाद
भैरव बाबा महाराजगंज
अवंतिकापुरी धाम
चंद्रमा ऋषि आश्रम
पल्हमेश्वरी मन्दिर

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