रायबरेली का इतिहास, भरौली या बरौली से रायबरेली आदि काल से आज तक in Hindi

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रायबरेली की गौरवशाली एवं वैभवशाली गाथा

रायबरेली का गौरव इतिहास: रायबरेली का इतिहास ऐतिहासिक दृष्टि से जनपद रायबरेली का अतीत अत्यंत गौरवशाली और महिमामंडित रहा है। पुरातात्विक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, भौगोलिक तथा औध्योगिक दृष्टि से रायबरेली का अपना विशिष्ट स्थान है। परिवर्तन के शाश्वत नियम के अनेक झंझावातों के बावजूद रायबरेली अस्तित्व अक्षुण्य् रहा है। रायबरेली मध्य उत्तर प्रदेश का एक अभिन्न और प्रख्यात हिस्सा रहा है। रायबरेली समृद्ध संस्कृति, भाषा और साहित्य की कहानियां हैं, जो पूरे भारत के लोगों को पता है। रायबरेली शहर लखनऊ के बहुत करीब है, उत्तर प्रदेश की राजधानी ने अतीत में बहुत लंबे समय से असंख्य प्रगति देखी है। रायबरेली जिला मध्ययुगीन काल में विशाल अवध क्षेत्र का एक हिस्सा था। रायबरेली एक फलता-फूलता शहर था, रायबरेली कला और संस्कृति के समृद्ध रूपों के साथ-साथ व्यापार के उत्कृष्ट विकल्प भी मौजूद थे। रायबरेली के लोग अपने व्यावसायिक कौशल और साहित्यिक उपलब्धियों के लिए जाने जाते हैं।

रायबरेली जिला उत्तर प्रदेश प्रांत के लखनऊ मंडल में स्थित है। रायबरेली उत्तरी अक्षांश में 25 ° 49 ‘से 26 ° 36’ तक और पूर्वी देशांतर में 100 ° 41 ‘से 81 ° 34’ तक स्थित है।

भरौली या बरौली = रायबरेली

पौराणिक रायबरेली: त्रेता युग के दौरान रायबरेली प्रसिद्ध कोशल साम्राज्य का एक हिस्सा था। जिसमे भगवान राम का शासन था। कोशल साम्राज्य की राजधानी अयोध्या थी, जो आज भी रायबरेली के बहुत करीब है। चूँकि रायबरेली अवध क्षेत्र का भी एक अभिन्न हिस्सा रहा है, इसलिए रायबरेली के लोग मुख्य रूप से अवधी बोलते हैं जो कि हिंदी भाषा का ही एक मूल रूप है।

त्रेता युग में रायबरेली: त्रेता युग के दौरान रायबरेली बहुत प्रसिद्ध कोशल साम्राज्य का एक हिस्सा था। जिसमे भगवान राम का शासन था।

भरौली या बरौली से रायबरेली: रायबरेली की स्थापना भर के राजवंश द्वारा की गई थी और इसलिए इसे भरौली या बरौली के रूप में जाना जाता था। जो बाद में परिवर्तित होकर बरेली हो गयी। उपसर्ग “राय” के बारे में कहा जाता है कि ये “राही” का बिगड़ा हुआ शब्द है, जो कि एक गांव है और यहाँ से 5 किमी दूर स्थित है। ये भी मान्यता है कि उपसर्ग राय यहाँ पर बसे कायस्थ जातियों के समूह, जो नगर पर काफी समय तक साशन किये थे।

रायबरेली का नाम रायबरेली क्यों पड़ा: रायबरेली में पहले भरो का शासनकाल था जिससे इसका नाम भरौली या बरौली था, लेकिन राय उपसर्ग को जोड़कर इसे रायबरेली कर दिया गया।

रायबरेली और कायस्थ समुदाय: रायबरेली के उपसर्ग राए में दो मिथक हैं, सबसे पहले रायबरेली के केंद्र से राही केवल 5 किलोमीटर दूर एक बहुत प्रसिद्ध गाँव है। दूसरे कायस्थ समुदाय और मनिहारों का गठन राय समुदाय जो अतीत में अधिकांश समय तक रायबरेली शहर पर राज किये थे। राय के शाशनकाल से बरौली का नाम रायबरेली हो गया।

वर्तमान में कायस्थ समुदाय मुख्य रूप से बिसारिया, श्रीवास्तव, सक्सेना,निगम, माथुर, भटनागर, लाभ, लाल, कुलश्रेष्ठ, अस्थाना, कर्ण, वर्मा, खरे, राय, सुरजध्वज, विश्वास, सरकार, बोस, दत्त, चक्रवर्ती, श्रेष्ठ, प्रभु, ठाकरे, आडवाणी, नाग, गुप्त, रक्षित, बक्शी, मुंशी, दत्ता, देशमुख, पटनायक, नायडू, सोम, पाल, राव, रेड्डी, दास, मेहता आदि उपनामों से जाने जाते हैं।

भार अधीन रायबरेली: 13वी सदी के प्रारंभ में रायबरेली पर भरो का शासन था यह शुरुआत से ही ज्ञात होता है कि रायबरेली की स्थापना भार के राजवंश द्वारा की गई थी और इसलिए इसे भरौली या बरौली के रूप में जाना जाता था। राज भार को बाद में राजपूतों और कुछ मुस्लिम उपनिवेशवादियों द्वारा विस्थापित कर दिया गया।

राजपूत के अधीन रायबरेली: रायबरेली पर कानपुरिया और अमेठी दो राजपूत वंशों ने शासन किया था जिन्होंने पूर्व और उत्तर-पूर्व में शासनकाल चलाया।

अकबर के अधीन रायबरेली: अकबर के शासन में रायबरेली जिले के अंतर्गत आने वाले क्षेत्र को ‘अवध के सरदारों’ और ‘लखनऊ के सरदारों’ के बीच विभाजित किया गया था। अकबर के शासनकाल के दौरान जिले द्वारा अवध और लखनऊ के बीच इलाहाबाद के सूबे जो जिले का बड़ा हिस्सा के रूप में शामिल किया गया। सरेनी, खिरो परगना और रायबरेली के परगना के पश्चिमी भाग को लखनऊ के सिरकार्स का हिस्सा बनाया। 1762 में मानिकपुर के सिरकार्स अवध के क्षेत्र में शामिल किया गया था और चकल्दार के तहत रखा गया था।

रायबरेली जनपद की स्थापना: रायबरेली की स्थापना एक जिले के रूप में ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा 1858 में की गई थी। यह वह समय था जब अंग्रेजों ने रायबरेली शहर को अपना मुख्यालय बनाया था।

रायबरेली में किसान आंदोलन: जब किसान तत्कालीन तालुकेदार के अत्याचारों से तंग आकर 5 जनवरी 1921 को अमोल शर्मा और बाबा जानकीदास के नेतृत्व में चंदनिहां में एक जनसभा की। दूर-दूर के गांवों के किसान भी सभा में भाग लेने आए थे। इस जनसभा को असफल बनाने के लिए तालुकेदार ने तत्कालीन जिलाधीश ए.जी. शॉरिफ से मिलकर दोनों नेताओं को फर्जी आरोपों में लखनऊ जेल भेज दिया, वहां उन पर मुकदमा चला, गिरफ़्तारी के अगले ही दिन रायबरेली में लोगों के बीच यह अफवाह तेज़ी से फैल गई कि लखनऊ के जेल प्रशासन द्वारा दोनों नेताओं की जेल में हत्या करवा दी गई है।

रायबरेली हत्याकांड 7 जनवरी 1921: रायबरेली में जब किसान अनंदोलन में ये अफवाह फ़ैल गयी की अमोल शर्मा और बाबा जानकीदास को लखनऊ के जेल प्रशासन द्वारा दोनों नेताओं की जेल में हत्या करवा दी गई है। तो जनवरी 7, 1921 को मुंशीगंज (रायबरेली) में सई नदी के एक छोर पर अपने नेताओं के समर्थन में एक विशाल जनसमूह एकत्रित होने लगा और एक भीषण युद्ध हुआ जिसमे कई लोगो की जान चली गयी। रायबरेली का ये हत्याकांड जलियावाले बाग़ हत्याकांड से कम नहीं था।

1966 में रायबरेली: कटिया, अहतिमा, रावत पुर, घिया, मौ, सुल्तानपुर अहेत्माली, किशुनपुर, डोमै और लौह्गी के गांवों में रायबरेली जिले में जिला फतेहपुर से तहसील के जनपद सरेनी डलमऊ में परिवर्तित कर दिया गया।

जनपद रायबरेली का आजादी में योगदान: रायबरेली के लोगों ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम के लिए साहसपूर्वक संघर्ष किया है। हर विद्रोह में रायबरेली के स्थानीय लोगों की बडी संख्या में भागीदारी और सक्रिय भूमिका दिखाई दी। देश के किसी भी कोने में हो रहे सभी स्वतंत्रता आंदोलनों के साथ जनपद रायबरेली ने हर कदम पर साथ दिया।

अंग्रेजो भारत छोड़ो आंदोलन: 8 अगस्त 1942 को भारत छोड़ो आंदोलन में इस जिले के लोगो ने भी बढ़ चढ़ कर भाग लिया। इस आंदोलन में जन गिरफ्तारी, सामूहिक जुर्माना, लाठी भांजना और पुलिस फायरिंग की गई। सरेनी में उत्तेजित भीड़ पर पुलिस ने गोलीबारी की जिसमे कई लोग शहीद हो गए और कई अपंग हो गए। इस जिले के लोग उत्साहपूर्वक व्यक्तिगत सत्याग्रह में भाग लिया और विदेशी जड़ो को हिलाकर रख दिया।

रायबरेली में आजादी की गाथाएं: उन्नाव के बैसवारा ताल्लुक के राजा राना बेनी माधव सिंह ने रायबरेली के एक बड़े हिस्से में अंग्रेजी हुकुमत के खिलाफ क्रांति की मशाल जलाई थी। अंग्रेजों के छक्के छुड़ाने वाले राजा बेनी माधव रायबरेली जिले के लिए महानायक बने। सन् 1857 की क्रांति के दौरान जनपद रायबरेली में बेनी माधव ने 18 महीने तक जिले को अंग्रेजों से स्वतंत्र कराया था।

राजा बेनी माधव प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की क्रांति: रायबरेली, उन्नाव और लखनऊ में अंग्रेजों की यातनाओ का सामना करने के लिए बैसवारा के राणा बेनीमाधव ने हजारों किसानों, मजदूरों को जोड़ कर क्रांति की जो मशाल जलाई। अनेक घेराबंदी के बाद भी अंग्रेज बेनी माधव को नहीं पा सके। शंकरपुर के शासक राजा बेनी माधव प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख योद्धाओं में से एक बने। अवध क्षेत्र के ह्रदय स्थल रायबरेली में 18 महीने तक अपनी सत्ता बनाने वाले बेनी माधव ने अंग्रेजों के खिलाफ जो गुरिल्ला युद्ध छेड़ा वह किसी मिशाल से कम नही है।

रायबरेली का साहित्यिक इतिहास: ऐतिहासिक रूप से अवध में मल्लिक मोहम्मद जायसी, थानराय और सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जैसे बहुत प्रसिद्ध कवियों द्वारा किए गए साहित्यिक कार्य सभी हिंदी साहित्य कट्टरपंथियों द्वारा प्रतिष्ठित हैं।

मल्लिक मोहम्मद जायसी: मलिक मुहम्मद जायसी (1477 – 1542) हिन्दी साहित्य के भक्ति काल की निर्गुण प्रेमाश्रयी धारा के कवि हैं। मल्लिक मोहम्मद जायसी का जन्म रायबरेली जिले के जायस में हुआ था। मलिक मुहम्मद जायसी अत्यंत उच्चकोटि के सरल और उदार सूफ़ी महात्मा थे। “पद्मावत” के नाम से लिखे गए उनके प्रसिद्ध साहित्य में चित्तौड़ की बेहद खूबसूरत रानी पद्मिनी और अलाउद्दीन खिलजी की विजय का विवरण है। यहां उन्होंने उल्लेखनीय रूप से रानी पद्मिनी और उनके पति रावल रतन सिंह के बीच चित्तौड़ के राजा के बीच मौजूद आध्यात्मिक प्रेम को कभी खत्म नहीं करने की कहानी बताई।

थान कवि (रीतिग्रंथकार कवि): रीतिकाल के रीतिग्रंथकार कवि थान कवि पूरा नाम थानराय था। डौंड़ियाखेर (रायबरेली) के निवासी और सुकवि चंदन बंदीजन के भांजे थे। निहालराय पिता, महासिंह पितामह और लालराय इनके प्रपितामह थे। चँड्रा (बैसवारा) के स्थानीय रईस दलेलसिंह के नाम पर इन्होंने सं 1840 वि में “दलेलप्रकाश” नामक रीतिग्रंथ की रचना की जिसमें रसों, भावों, गणों अलंकारों और काव्य गुण दोषों को अच्छी तरह समझाया गया है।

मुनव्वर राना: मुनव्वर राना (जन्म 26 नवंबर 1952, रायबरेली, उत्तर प्रदेश) उर्दू भाषा के साहित्यकार हैं। मुनव्वर राना द्वारा रचित एक कविता शाहदाबा के लिये उन्हें सन् 2014 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। मुनव्वर राना लखनऊ में रहते हैं। भारत-पाकिस्तान बंटवारे के समय उनके बहुत से नजदीकी रिश्तेदार और पारिवारिक सदस्य देश छोड़कर पाकिस्तान चले गए। लेकिन साम्प्रदायिक तनाव के बावजूद मुनव्वर राना के पिता ने अपने देश में रहने को ही अपना कर्तव्य माना। मुनव्वर राना की शुरुआती शिक्षा-दीक्षा कलकत्ता (नया नाम कोलकाता) में हुई। राना ने ग़ज़लों के अलावा संस्मरण भी लिखे हैं। मुनव्वर राना लेखन की लोकप्रियता का पता इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनकी रचनाओं का ऊर्दू के अलावा अन्य भाषाओं में भी अनुवाद हुआ है।

मशहूर शायर मुन्नवर राणा ने अपने अंदाज़ में कहा, “रायबरेली वह शहर है जहां की नालियों से होकर सियासत गुजरती है”.

महराजगंज/रायबरेली (डलमऊ): छायावाद के प्रमुख स्तम्भ महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला हिन्दी साहित्य की अमूल्य धरोहर है। जिनका ऋणी आज भी समाज है। वह कैसे हिन्दी साहित्य के निराला बने इसके पीछे भी उनकी पत्नी सहित ससुराल डलमऊ (रायबरेली) और वहां के सुन्दर गंगा घाटों की कहानी है। रायबरेली से 30 किमी की दूरी पर बसा डलमऊ कस्बा निराला की ऐतिहासिक साहित्यिक यात्रा का साथी रहा है।

देवीप्रसाद मिश्र वेदांती: रायबरेली क्षेत्र के वरिष्ठ साहित्यकार देवीप्रसाद मिश्र वेदांती एवं नव गीतकार पीयूष मिश्र को भारती परिषद प्रयाग द्वारा प्रज्ञा भारती सम्मान से सम्मानित किया गया। यह सम्मान विगत दिनों हिंदुस्तानी अकादमी इलाहाबाद में आयोजित एक समारोह में पश्चिम बंगाल के राज्यपाल पं केशरीनाथ त्रिपाठी, उप्र राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. एमपी दुबे व संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो अभिराज राजेंद्र मिश्र ने प्रदान किया।

उल्लेखनीय लोग का रायबरेली के सम्बन्ध 

सोनिया गांधी: सोनिया गांधी (जन्म 9 दिसम्बर1946) एक भारतीय राजनेता और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष हैं। सोनिया गांधी रायबरेली, उत्तरप्रदेश से सांसद हैं और इसके साथ ही वे 15वीं लोकसभा में न सिर्फ़ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, बल्कि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) की भी प्रमुख हैं। सोनिया गांधी 14वीं लोक सभा में भी यूपीए की अध्यक्ष थीं। श्रीमती गांधी कांग्रेस के 132 वर्षो के इतिहास में सर्वाधिक लंबे समय तक रहने वाली अध्यक्ष है, वह 1998 से 2017 तक इस पद को सुशोभित कर रही थी।

बनवारी लाल: ब्रिटिश काल के दौरान उत्तर प्रदेश में गठित क्रान्तिकारी संगठन हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन का सक्रिय सदस्य ही नहीं अपितु रायबरेली का जिला संगठनकर्ता भी था। 1 अगस्त 1925 को काकोरी के समीप हुई ऐतिहासिक डकैती में समूचे हिन्दुस्तान से 40 व्यक्तियों को गिरफ्तार किया गया था। बनवारी लाल की गिरफ्तारी रायबरेली से हुई थी।

बृज नारायण चकबस्त: ब्रजनारायण चकबस्त (1882–1926) उर्दू कवि थे। यद्यपि ब्रजनारायण चकबस्त पूर्वज लखनऊ के निवासी थे तथापि इनका जन्म फैजाबाद में हुआ था। ब्रजनारायण चकबस्त समाजसुधारक थे। एक मुकदमे से रायबरेली से लौटते समय 12 फ़रवरी सन्‌ 1926 ई. को स्टेशन पर ही फालिज का ऐसा आक्रमण हुआ कि कुछ ही घंटों में इनकी मृत्यु हो गई।

सैयद सिब्ते रज़ी: सैयद सिब्ते रज़ी का जन्म 7 मार्च 1939 रायबरेली, उत्तर प्रदेश भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी के एक राजनायिक हैं। सैयद सिब्ते रज़ी राज्य सभा के तीन बार सदस्य रहे। बाद में सैयद सिब्ते रज़ी झारखंड और असम का राज्यपाल भी बनाया गया।

रायबरेली के प्रमुख पर्यटन स्थल,रायबरेली दर्शनीय स्थल, रायबरेली मे घूमने लायक जगह: समसपुर पक्षी विहार, डलमऊ, इंदिरा गांधी स्मारक वानस्पतिक उद्यान, बेहटा पुल, नसीराबाद, जायस आदि रायबरेली के प्रमुख स्थल है।

रायबरेली के सन्दर्भ में: रायबरेली के अनछुए गुप्त रहस्य, रायबरेली का पुराना नाम क्या है?, रायबरेली जिला का नाम रायबरेली कैसे पड़ा?, रायबरेली जिले का प्राचीन गोप नीय इतिहास, रायबरेली की कथा, कहानियों का नगर रायबरेली, रायबरेली के रहस्य, रायबरेली क्यों प्रसिद्द है। रायबरेली का वर्तमान, अतीत, भूत और भविष्य का इतिहास एवं untouched points (अछूते पहलू)। रायबरेली का स्वर्णिम इतिहास। रायबरेली की वैदिक, पौराणिक, सांस्कृतिक, भौगोलिक, राजनितिक, ऐतिहासिक, सामाजिक, आर्थिक, सैन्य विशेषताएँ और रायबरेली का महत्व।

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