जैसलमेर किला या सोनार किला जैसलमेर राजस्थान-इतिहास

 जैसलमेर किला विश्व की धरोहर

भारत अपनी कई ऐतिहासिक धरोहरों के लिए प्रसिद्ध है, जिसमे उनकी अदभुत, अलौकिक, अविश्वश्नीय, अकल्पनीय बनावट और अनोखी वास्तुशिल्प के लिए उन्हें विश्व धरोहर की सूची में रखा गया है। ऐसा ही एक किला राजस्थान के जैसलमेर जिले में स्थित है, जो अपनी अदभुत वास्तुशिल्प और बनावट के साथ- साथ अनेको राज को अपने में सजोये हुआ है। दोस्तों आज हम बात कर रहे है राजस्थान की शान जैसलमेर के किले के बारे में। यह भारत के सुदूर पश्चिम में स्थित है, इस किले का निर्माण 1156 ई० में इक भाटी राजपूत शासक जैसल द्वारा किया गया। यह किला त्रिकुरा नामक पहाड़ी के शीर्ष पर स्थित है। इस किले का निर्माण पीला बलुआ पत्थर से हुआ है, सूर्यास्त के समय जब सूर्य की किरण इस किले पे पड़ती है, तो ये किला सोने की तरह चमकता है इसलिए इसे सोनार किले के नाम से भी जाना जाता है।

जैसलमेर राजस्थान के प्रमुख विश्व बिख्यात दर्शनीय स्थल

जैसलमेर किले का इतिहास-Jaisalmer Fort History



जैसलमेर का किला एक विश्व विरासत है। इस किले ने किले ने कई लड़ाइयों और युद्धों को देखा है। 1156 ई० में राजपूत शासक रावल जैसल ने किले का निर्माण किया था, जो कि जैसलमेर के सबसे शक्तिशाली शासकों में से एक थे। जिनके नाम से इसका नाम मिलता है। जिसने अपने भतीजे भोजदेव को गद्दी से उतरने के लिए गौर के सुल्तान के साथ साजिश की थी। दिल्ली के सुल्तान द्वारा दो मुस्लिम आक्रमणों के बाद 1276 ई में महारावल जेतासी द्वारा किले की रक्षा संरचना के रूप में रंग बुर्ज को किले में जोड़ा गया था। तेरहवीं शताब्दी में अला-उद-दीन-खिलजी द्वारा किले पर फिर से हमला किया गया, जिसने राजपूत महिलाओं को आत्म-हीनता के लिए मजबूर कर दिया। 1541 में हुमायूँ के हमले के बाद मुगल के खिलाफ रावल की अवज्ञा अंततः टूट गई और उसने अपनी बेटी की शादी अकबर से की जो हुमायूँ का उत्तराधिकारी था। किला 1762 तक मुगलों के नियंत्रण में था जब महाराज मुलराज ने किले का नियंत्रण ग्रहण कर लिया था। अपने पृथक स्थान के कारण, किले मराठों के विनाश से बच गया । 12 दिसंबर 1818 को ईस्ट इंडिया कंपनी और मुलराज के बीच हुई संधि ने मूलराज को किले का नियंत्रण बरकरार रखने की अनुमति दी और आक्रमण से सुरक्षा प्रदान की। 1820 में मूलराज की मृत्यु के बाद, उनके पोते गज सिंह ने किले में राज करा।

Jaisalmer Fort History or Sonar Fort History in Hindi

जैसलमेर किले की वास्तुकला – Jaisalmer Fort Architecture


जैसलमेर का किला एक वर्ल्ड हैरिटेज साइट है। दुनिया भर से लोग इस किले को देखने आते है। बेजोड़ शैली में निर्मित यह क़िला स्थानीय कारीगरों द्वारा शाही परिवार के लिए बनाया गया था। किले के परिसर में कई वास्तुशिल्प भवन है जिनमें महल, मकान और मंदिर शामिल हैं जिनका निर्माण नरम बलुआ पत्थर से हुआ है जैसलमेर का किला 250 फीट की ऊंचाई पर एक पहाड़ी पर बनाया गया है इसकी लम्बाई 1500 फ़ीट और चौड़ाई 750 फ़ीट है, किले के तहखाने में 15 फ़ीट लम्बी दीवार है, जिसमे रक्षा की एक दोहरी रेखा है। किले में चार प्रवेश द्वार बनाये गए हैं, जिनमें से एक तोप से रक्षा करता था। किले की दीवारों के शिखर पर एक व्यक्तिगत उपकरण है जिसका इस्तेमाल मौसम की जानकारी के लिए किया जाता था। इसकी बनावट में इस्लामी और राजपूती वास्तुकला शैली का सुन्दर मिश्रण मिलता है जैसलमेर किले के अंदर संकीर्ण घुमाव रास्ते है जो किले के बहुत से हिस्सों को आपस में जोड़ता है। जैसलमेर किला का परिसर इतना विशाल है कि शहर की लगभग एक-चौथाई जनसंख्या इस किले में रह सकती है। सोनार किले के परिसर में कई इमारतें जैसे महल मंदिर, घर, कुएँ, हवेलिया शामिल है जिन्हें हल्के पीले बलुआ पत्थरों से तैयार किया गया था, जिसमे एक जटिल नक्काशी और डिजाइन युक्त बालकनी, खिड़कियां और हवेलियों में मेहराब की सजावट दिखाई देती है। किले में हवा पोल, गणेश पोल, रंग पोल और जवाहर पोल,जैसे कई प्रवेश द्वार है जो विशिष्ट और उत्कृष्ट रूप से तैयार किए गए हैं, और ज़िगज़ैग मार्ग पर अंतिम द्वार दशहरा चौक की ओर जाता है। सोनार किला ’किले का मुख्य आकर्षण महारावल पैलेस है जो अपने संगमरमर के सिंहासन के लिए लोकप्रिय है। जिसके ठीक सामने ताज़िया टॉवर नामक पाँच मंजिला टॉवर स्थित है।

ताजिया टॉवर/ मंदिर पैलेश Tajiya Tower Jaisalmer



ताजिया टॉवर/ मंदिर पैलेश निर्माण के 200 साल तक यह जैसलमेर के शासको का निवास स्थान था। अगर हम इसकी बनावट की बात करे तो इसका निर्माण एक के ऊपर एक मंजिल बिलकुल ताजिये के आकर में किया गया है इसलिए इसे ताजिया टावर भी कहा जाता है। महल की प्रत्येक मंजिल में एक अद्भुत नक़्काशीदार छज्जा तथा चारो तरफ पत्थर की सुन्दर नक्कासी की गई जलिया है जो इसकी सुंदरता में चार चाँद लगाती है। यह पैलेस मुस्लिम कारीगरों की कला कौशल का एक बेहतरीन नमूना है। अब यह मंदिर पैलेस पर्यटकों के लिए, हैरिटेज होटल के रूप में संचालित किया जा रहा है, जहाँ रहकर पर्यटक स्वयं को महाराजा और महारानी महसूस करते हैं।

गड़ीसर झील-Gadisar Lake Jaisalmer 



गड़ीसर झील का निर्माण 13वीं शताब्दी में एक तालाब के रूप में राजा रावल जैसल द्वारा किया गया था। उन दिनों पानी की समस्या को देखते हुए इस तालाब का निर्माण किया गया था परन्तु कुछ वर्षों बाद महाराजा गड़सीसर सिंह द्वारा इसे पुननिर्मित करवाया गया। यह झील जैसलमेर के दक्षिण में स्थित है, जब हम गड़ीसर झील के पास जाते हैं तो सबसे पहले एक विशाल प्रवेश द्वार दिखेगा जिसे टीलन का द्वार कहा जाता है। इस झील का निर्माण सुन्दर नक़्काशीदार, पीले पत्थर से किया गया है जो गेट के अन्दर जाकर नज़र आते है। इसके आसपास कई छोटे मंदिर और तीर्थस्थल स्थित है जो इस झील की सुंदरता में चार चाँद लगते है इस झील में बहुत सी छतरियां बनी है, सूर्योदय और सूर्यास्त के वक्त जब सूर्य की किरण इन छतरियो पर पड़ती है तो ये नजारा देखने लायक होता है।

पटवों की हवेली – Patavon ki Haveli Jaisalmer



पटवों की हवेली के अंदर पाँच हवेलियाँ हैं इसका निर्माण एक अमीर व्यापारी गुमान चंद पटवा द्वारा 1805 ई० में अपने पाँच बेटों के लिए करवाया गया था। इसके निर्माण कार्य में 50 साल लग गए थे। यह जैसलमेर की सबसे बड़ी और सबसे ख़ूबसूरत नक़्काशीदार हवेली, यह पांच मंज़िला संरचना एक संकरी गली में गर्व से खड़ी है। पर समय के साथ इसकी रौनक भी धीमी होती चली जा रही है फिर भी कुछ चित्रकारी और काँच का काम अभी भी अंदर की दीवारों पर देखकर इसकी उस समय की भव्यता का अनुमान लगाया जा सकता है। यह हवेली एक पतली गली के अन्दर है इसलिए पर्यटक इस हवेली को देखने के लिए पैदल या रिक्शे में आ सकते हैं।

सालिम सिंह की हवेली/ मोती महल Moti Mahal Jaisalmer

 


सालिम सिंह की हवेली/ मोती महल, 18वीं शताब्दी के आरंभ में सलीम सिंह द्वारा बनवाई गई सलीम सिंह की हवेली जैसलमेर की प्रसिद्ध हवेलियों में से एक है। यह हवेली, जैसलमेर के एक दीवान सालिम सिंह का निवास था जिसे मोती महल के नाम से भी जाना जाता है। हवेली में सुंदर विस्तृत नक्काशी के साथ 38 बालकनियाँ, ऊंचे मेहराबदार छत में खाँचे बांटकर मोर के आकार से अलंकरण तैयार किये गये हैं। जो पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। इस हवेली का इतिहास 300 साल पुराना माना जाता है। इस इमारत के केंद्रीय अक्ष को एक विशालकाय सुन्दर जहाज का आकर दिया गया है इसलिए इसे स्थानीय निवासी जहाज महल भी कहते है। कहा जाता है की सलीम सिंह ने इस हवेली को पांच मंजिला बनाया था पर इसकी सुंदरता को देखकर राजा ने ईर्ष्यावश इसके दो मंजिलो को तोड़ने का आदेश दे दिया। स्वर्ण आभूषणों जैसी इस हवेली को पर्यटक बड़े विस्मय से देखते हैं।

नथमल जी की हवेली-Nathmal Ji ki Havweli Jaisalmer


नथमल जी की हवेली जैसलमेर के महारावल बैरीसाल सिंह जी भाटी ने 1885 ई. में इसका निर्माण करवाया था। महारावल जी ने इस हवेली को अपने दीवान मोहता नथमल जी को उपहार स्वरूप भेंट किया था। महारावल बेरीसाल द्वारा निर्मित, तथा दो भाईयों-हाथी और लूलू, जो कि बहुत ही जबरदस्त वास्तुकार थे, उन्होंने ही इस हवेली की वास्तुकला में सहयोग किया। यह हवेली अपने सुंदर आंतरिक सज्जा चित्रों से भरी हुई है मुख्य द्वार पर दो पत्थर के हाथी देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि आपके स्वागत के लिए खड़े हैं। 19वीं शताब्दी में दो वास्तुकार भाईयों ने ’नथमल जी की हवेली’ का निर्माण किया। उन्होंने दो तरफ से हवेली पर काम किया और इसका परिणाम सम विभाजित संरचना के एक सुन्दर रूप में सामने आया। मिनिएचर शैली के चित्रों और पीले बलुआ पत्थर पर नक़्काशीदार हाथी सजावट के लिए प्रयोग किये गये हैं। इस हवेली का प्रारूप तथा नक़्काशी अन्य सभी हवेलियों से अलग हैं।

अमर सागर झील-Amar Sagar Jhil Jaisalmer

 


जैसलमेर के पश्चिमी क्षेत्र में लगभग 7 किलोमीटर कि दूरी पर अमर सागर झील स्थित है जो कि अमर सिंह पैलेस के पास ही है। जैसलमेर और लौद्रवा के बीच अमरसागर एक रमणिक स्थान है। अमरसागर मंदिर, तालाब तथा उद्यान का निर्माण महारावल अमरसिंह द्वारा विक्रम संवत् 1721 से 1751 के बीच किया गया था। 17वीं शताब्दी में बनवाया गया यह महल झील पत्थर के नक्काशीदार जानवरों के मुखौटो से घिरा है, जिन्हें शाही परिवार का संरक्षक माना जाता है। अमर सिंह पैलेस से कई सीढ़ियाँ आपको सुंदर और शांत झील की ओर ले जाती हैं। महल और झील के परिसर में एक प्राचीन शिव मंदिर के साथ कई कुएं और तालाब भी स्थित हैं। इस झील का शांत और रोचक वातावरण आपको मंत्र मुग्ध कर देगा। यहाँ बैठकर आप सूर्यास्त का सुनहरा नजारा भी देख सकते है।

बड़ा बाग-Bada Bag Jaisalmer


बड़ा बाग एक विशाल पार्क है तथा यह भाटी राजाओं की स्मृतियों को समेटे हुए जैसलमेर के उत्तर में 6 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह जैसलमेर के महाराजाओं के शाही समाधि स्थल या छत्रियों का समूह है, यहां से पर्यटकों को सूर्यास्त का अद्भुत दृश्य भी देखने को मिलता है। स्मारक विभिन्न आकारों के हैं और बलुआ पत्थर के नक्काशीदार हैं। शासकों, रानियों, राजकुमारों और अन्य शाही परिवार के सदस्यों के स्मारक बनाये गए हैं।ये छतरी बनाने का अधिकार शाही परिवार के देहवासी राजा के पोते का होता है। महारावल जैसल सिंह के वंशज, 16 वीं शताब्दी में उनके शासनकाल के दौरान एक पानी की टंकी बनाने के लिए यहाँ एक बांध बनाया था। इससे इस क्षेत्र में रेगिस्तान हरा हो गया। उनकी मृत्यु के बाद 1743 में उनके पुत्र लूणकरण ने अपने पिता की छतरी यहाँ बनवाई थी। उसके बाद अन्य राजाओं की मृत्यु के बाद उनकी भी छतरियाँ यहाँ बनाई गईं।

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